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औषधि रहित प्रकृतिक चिकित्सा द्वारा उपचार

इस लेख में निर्देशित सिद्धान्त एवं सरल उपाय न केवल निरोग रहने में सहायक सिद्ध होंगे, बल्कि असाध्य रोगों जैसे कि  माइग्रेन, दमा/अस्थमा, बबासीर, अन्धापन, फॉलिस, साइटिका, घुटने का दर्द, सूजन, खाज खुजली, ह्रदय रोग एवं यकृत सम्बंधी समस्यायें, कंधों का जाम होना, गठिया, मोटापा, पीठ का दर्द, स्पॉन्डिलाइटिस, इत्यादि का बिना किसी महँगी जाँच एवं औषधि के छुटकारा पाया जा सकता है और पूरी तरह से ठीक हो सकता है।

(1) अति आवश्यक–

ईश्वर द्वारा दी गयी स्व-उपचारात्मक  शक्ति में विश्वास करें जो कि हम सभी के अन्दर प्राकृतिक रूप में विध्यमान है। निरोग रहने के  लिये सिर्फ यही एक शक्ति है । शक्तिमान ईश्वर से जुड़कर ही आप शक्ति प्राप्त करें। ईश्वर से प्रार्थना करें। जहाँ कही भी सम्भव हो वास्तु दोष को ठीक करें।

(2)  निद्रा के  लिये दिशा एवं समय –

रात्रि में जल्दी सोये एवं प्रातः जल्दी उठें । सोते वक्त सिर दक्षिण में हो। स्वास्थ के लिये यदि उपरोक्त दिशा में सोना सम्भव न हो, तो आप दक्षिण – पश्चिम में सिर रखकर सो सकते हें। एक दम पूर्व या पश्चिम में सिर रखकर सो सकते हें परन्तु यह दिशा अच्छे स्वास्थ के  लिये लाभदायक नही।

सावधानी- कभी भी उत्तर – पूर्व (North-East), उत्तर (North), अथवा उत्तर – पश्चिम (North – West) दिशा में सिर रखकर न सोये यह केवल अनैच्छिक ही नही बल्की स्वास्थय के लिये नुकसान दायक है। दक्षिण – पूर्व में सिर रखकर सोना भी नुकसान दायक एवं स्वास्थय की दृष्टि से ठीक नही है।

(3)   सोने के लिए बिस्तर के प्रकार –

एक समान, समतल    एवं ठोस बिस्तर हो (जैसे कि दो इंच मोटा  नारियल का ठोस गद्दा या ओर्थोपेडिक नारियल का गद्दा 

जमीन पर या लकड़ी के तख्त पर साधारण चटाई, गलीचा या एक या दो कम्बल या एक इंच मोटी रजाई/ गद्दा जमीन पर डाल कर भी सो सकते है।